नवरात्रि का सम्पूर्ण मार्गदर्शन | इतिहास, नवदुर्गा, पूजा-विधि, व्रत, ज्योतिष एवं आध्यात्मिक रहस्य

नवरात्रि : सम्पूर्ण शास्त्रीय ज्ञानकोश

इतिहास, शास्त्रीय आधार, आध्यात्मिक रहस्य, पूजा-विधि, नवदुर्गा, ज्योतिष एवं जीवन-दर्शन

भूमिका

क्या आपने कभी सोचा है कि सनातन धर्म में वर्ष भर अनेक पर्व मनाए जाते हैं, किन्तु नवरात्रि का स्थान इतना विशिष्ट क्यों है?

दीपावली समृद्धि का पर्व है, होली उल्लास का, रक्षाबंधन स्नेह का और जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का। परन्तु नवरात्रि इन सबसे भिन्न है। यह केवल किसी ऐतिहासिक घटना का स्मरण नहीं, न ही केवल किसी देवी की आराधना का अवसर है। यह मनुष्य के भीतर सुप्त पड़ी दैवी शक्ति को जागृत करने का नौ दिवसीय आध्यात्मिक अभियान है।

यदि हम भारतीय संस्कृति को एक विराट वृक्ष मानें, तो नवरात्रि उसकी उन जड़ों में से एक है जहाँ धर्म, दर्शन, योग, तंत्र, आयुर्वेद, ज्योतिष और अध्यात्म एक-दूसरे से मिलते दिखाई देते हैं। यही कारण है कि नवरात्रि को समझे बिना भारतीय आध्यात्मिक परम्परा को पूरी तरह समझना कठिन है।

दुर्भाग्य से आज नवरात्रि के विषय में अधिकांश चर्चा केवल इस तक सीमित रह गई है कि किस दिन कौन-सी देवी की पूजा करनी है, कौन-सा रंग पहनना है, कौन-सा भोग लगाना है या कौन-सा व्रत रखना है। ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं, परंतु इनसे भी अधिक महत्वपूर्ण है यह समझना कि इन परम्पराओं की उत्पत्ति क्यों हुई? इनके पीछे शास्त्र क्या कहते हैं? और इनका हमारे जीवन से क्या संबंध है?

इसी उद्देश्य से प्रस्तुत है यह विस्तृत मार्गदर्शिका, जिसमें हम नवरात्रि को केवल एक पर्व नहीं, बल्कि शक्ति, साधना, आत्मपरिवर्तन और सनातन दर्शन के आलोक में समझने का प्रयास करेंगे।


नवरात्रि क्या है?

"नवरात्रि" शब्द दो पदों से मिलकर बना है—

  • नव — अर्थात् नौ, नवीनता, नवजीवन और पूर्णता।

  • रात्रि — अर्थात् वह काल जिसमें बाहरी गतिविधियाँ शांत होकर मनुष्य भीतर की ओर मुड़ता है।

भारतीय दर्शन में "रात्रि" केवल अंधकार का नाम नहीं है। यह अन्तर्मुखी होने का समय है। दिन का संबंध कर्म से है, जबकि रात्रि का संबंध चिंतन, साधना और आत्मसंवाद से है।

इसीलिए अनेक वैदिक तथा तांत्रिक साधनाएँ रात्रिकाल में अधिक फलदायी मानी गई हैं।

नवरात्रि की नौ रात्रियाँ इस बात का संकेत हैं कि आत्मपरिवर्तन एक क्रमिक प्रक्रिया है। जैसे बीज एक ही दिन में वृक्ष नहीं बनता, वैसे ही मनुष्य भी एक ही दिन में पूर्ण नहीं होता। उसे क्रमशः अपने भीतर के अज्ञान, भय, आलस्य, मोह, क्रोध और अहंकार पर विजय प्राप्त करनी होती है।


शास्त्र क्या कहते हैं?

ऋग्वेद (10.125) के प्रसिद्ध देवीसूक्त में वाक्-देवी स्वयं कहती हैं—

"अहं राष्ट्री संगमनी वसूनां..."

अर्थात् मैं ही देवताओं की शक्ति हूँ, मैं ही समस्त जगत् में व्याप्त चेतना हूँ।

यह सूक्त स्पष्ट करता है कि शक्ति किसी एक देवी की सीमित अवधारणा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण सृष्टि की मूल चेतना है। बाद के पुराणों और शक्ति-परम्पराओं में यही दार्शनिक विचार आदिशक्ति, दुर्गा, चण्डिका और जगदम्बा के रूप में विकसित हुआ।


नवरात्रि की उत्पत्ति

नवरात्रि का उल्लेख अनेक पुराणों में मिलता है, किन्तु इसकी सर्वाधिक प्रभावशाली व्याख्या मार्कण्डेय पुराण के देवी महात्म्य (दुर्गा सप्तशती) में प्राप्त होती है।

देवी महात्म्य में तीन प्रमुख चरित्रों के माध्यम से यह बताया गया है कि जब-जब देवशक्तियाँ असुरों के अत्याचार से पराजित होने लगती हैं, तब समस्त देवताओं का तेज एकत्र होकर आदिशक्ति का रूप धारण करता है।

महिषासुर, शुम्भ, निशुम्भ, चण्ड, मुण्ड और रक्तबीज जैसे असुर केवल पौराणिक पात्र नहीं हैं। वे मानव-मन की उन प्रवृत्तियों के प्रतीक हैं जो जीवन को अधर्म, अहंकार और अविवेक की ओर ले जाती हैं।

इसीलिए देवी का प्रत्येक युद्ध वास्तव में मनुष्य के भीतर चलने वाले आध्यात्मिक संघर्ष का भी प्रतीक है।


देवी केवल युद्ध की अधिष्ठात्री नहीं हैं

दुर्गा सप्तशती का एक अत्यंत प्रसिद्ध स्तोत्र है—

"या देवी सर्वभूतेषु बुद्धिरूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥"

इसी स्तुति में देवी को—

  • बुद्धि,

  • श्रद्धा,

  • स्मृति,

  • निद्रा,

  • क्षुधा,

  • करुणा,

  • शक्ति,

  • लक्ष्मी,

  • तुष्टि,

  • शान्ति

के रूप में प्रणाम किया गया है।

इसका अर्थ अत्यंत गहरा है।

सनातन धर्म यह नहीं कहता कि देवी केवल मंदिर की प्रतिमा में निवास करती हैं। वह कहता है कि जहाँ भी बुद्धि है, करुणा है, सत्य है, स्मृति है, धर्म है—वहीं शक्ति का निवास है।

यही नवरात्रि का मूल दर्शन है।


वर्ष में चार नवरात्रियाँ क्यों आती हैं?

अधिकांश लोग केवल चैत्र और शारदीय नवरात्रि से परिचित हैं, जबकि शास्त्रीय परम्परा वर्ष में चार नवरात्रियों का उल्लेख करती है—

  1. चैत्र नवरात्रि

  2. आषाढ़ गुप्त नवरात्रि

  3. शारदीय नवरात्रि

  4. माघ गुप्त नवरात्रि

इनमें चैत्र और शारदीय नवरात्रि सार्वजनिक रूप से व्यापक स्तर पर मनाई जाती हैं, जबकि आषाढ़ और माघ की गुप्त नवरात्रियाँ विशेष रूप से शक्ति-साधना और तांत्रिक उपासना की परम्पराओं में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं।


ऋतु-संधि और नवरात्रि

एक रोचक तथ्य यह है कि चैत्र और शारदीय नवरात्रि दोनों ऋतु-संधि के समय आती हैं।

ऋतु-संधि का अर्थ है—दो ऋतुओं का मिलन।

आयुर्वेद कहता है कि इस समय शरीर स्वयं को नई जलवायु के अनुरूप ढालता है। इसलिए आहार, निद्रा और दिनचर्या में संयम रखने की सलाह दी जाती है।

भारतीय ऋषियों ने इसी प्राकृतिक परिवर्तन को आध्यात्मिक अनुशासन के साथ जोड़ दिया।

इस प्रकार नवरात्रि केवल धार्मिक उत्सव नहीं रही, बल्कि प्रकृति और मनुष्य के बीच संतुलन स्थापित करने का वैज्ञानिक एवं आध्यात्मिक अवसर बन गई।


क्या आप जानते हैं?

संस्कृत में "उपवास" का अर्थ केवल भोजन का त्याग नहीं है।

"उप" का अर्थ है निकट, और "वास" का अर्थ है निवास

अर्थात्—ईश्वर के अधिक निकट रहना।

इसीलिए यदि कोई व्यक्ति पूरे दिन फलाहार करे, परन्तु क्रोध, असत्य और कटु वाणी से भरा रहे, तो शास्त्रीय दृष्टि से उसका उपवास अधूरा माना जाएगा।


नवरात्रि का वास्तविक उद्देश्य

यदि इस पूरे पर्व को एक ही वाक्य में समझाना हो, तो कहा जा सकता है—

नवरात्रि का उद्देश्य देवी को बदलना नहीं, स्वयं को बदलना है।

यही कारण है कि इन नौ दिनों में केवल पूजा नहीं, बल्कि—

  • आहार का संयम,

  • विचारों की शुद्धि,

  • वाणी की मर्यादा,

  • दान,

  • सेवा,

  • जप,

  • ध्यान,

  • आत्मनिरीक्षण,

इन सब पर समान बल दिया गया है।

देवी की आराधना का सर्वोच्च रूप केवल पुष्प अर्पित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के अहंकार, क्रोध, लोभ और ईर्ष्या का त्याग करना है।

यहीं से नवरात्रि की वास्तविक यात्रा प्रारम्भ होती है।

नवरात्रि का आध्यात्मिक विज्ञान : नौ रात्रियाँ ही क्यों?

यदि कोई प्रश्न नवरात्रि के विषय में सबसे अधिक महत्वपूर्ण है, तो वह यह है—आख़िर देवी की आराधना के लिए नौ रात्रियाँ ही क्यों निर्धारित की गईं? सात क्यों नहीं, दस क्यों नहीं?

इस प्रश्न का उत्तर केवल पौराणिक कथाओं में नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन, योग, तंत्र और मनोविज्ञान में छिपा है।

सनातन परम्परा संख्या नौ (९) को पूर्णता का प्रतीक मानती है। गणित में भी नौ एक विलक्षण संख्या है—किसी भी संख्या से उसका गुणा करने पर उसके अंकों का योग पुनः नौ पर आकर स्थिर हो जाता है। भारतीय मनीषियों ने इस गणितीय विशेषता को आध्यात्मिक प्रतीक के रूप में भी देखा। उनके लिए नौ का अर्थ था—पूर्ण विकास की अंतिम अवस्था।

इसी कारण भारतीय परम्परा में नौ का विशेष महत्व दिखाई देता है—

  • नवदुर्गा

  • नवग्रह

  • नवरस

  • नवधा भक्ति

  • नव नाथ

  • नव निधियाँ

  • नव रत्न

नवरात्रि की नौ रात्रियाँ भी साधक को क्रमशः आत्मविकास की नौ सीढ़ियाँ चढ़ाने का प्रतीक हैं।


रात्रि ही क्यों?

यह भी एक रोचक प्रश्न है कि पर्व का नाम नवरात्रि है, नवदिवस नहीं।

भारतीय दर्शन में रात्रि अज्ञान का नहीं, बल्कि अन्तर्मुखता का प्रतीक है।

दिन में हमारी इन्द्रियाँ बाहर की ओर सक्रिय रहती हैं; रात्रि में बाहरी गतिविधियाँ शांत होती हैं और मन अपने भीतर उतरने में अधिक समर्थ होता है। इसीलिए अनेक ऋषियों ने रात्रिकाल को जप, ध्यान और उपासना के लिए श्रेष्ठ माना।

देवीमहात्म्य का संदेश भी यही है कि वास्तविक युद्ध बाहर नहीं, भीतर होता है। और भीतर उतरने की यात्रा का प्रतीक है—रात्रि।


नवरात्रि : बाहरी पूजा से पहले आन्तरिक साधना

आज अनेक लोग नवरात्रि की तैयारी घर की सजावट, पूजन सामग्री और व्रत के भोजन से आरम्भ करते हैं। ये सभी बातें महत्वपूर्ण हैं, किन्तु शास्त्र एक और तैयारी की बात करते हैं—मन की तैयारी।

यदि मन ईर्ष्या, क्रोध, छल और अहंकार से भरा है, तो पूजा की भव्यता भी अधूरी रह जाती है।

इसीलिए नवरात्रि प्रारम्भ होने से पहले अपने आप से कुछ प्रश्न अवश्य पूछिए—

  • क्या मैं किसी के प्रति अनावश्यक द्वेष रखता हूँ?

  • क्या मेरी वाणी दूसरों को कष्ट पहुँचाती है?

  • क्या मैं अपने माता-पिता, गुरु और परिवार के प्रति कृतज्ञ हूँ?

  • क्या मेरे जीवन में अनुशासन है?

  • क्या मैं प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिन्तन के लिए निकालता हूँ?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर खोजने की शुरुआत हो जाए, तो समझिए नवरात्रि की साधना प्रारम्भ हो चुकी है।


शास्त्र कहते हैं

देवीमहात्म्य में देवी को केवल युद्ध करने वाली शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि—

"या देवी सर्वभूतेषु श्रद्धारूपेण संस्थिता..."
"या देवी सर्वभूतेषु दयारूपेण संस्थिता..."
"या देवी सर्वभूतेषु शान्तिरूपेण संस्थिता..."

कहकर प्रणाम किया गया है।

अर्थ स्पष्ट है—यदि हमारे भीतर श्रद्धा, दया और शान्ति का विकास नहीं हो रहा, तो देवी-उपासना का उद्देश्य अभी अधूरा है।


घटस्थापना : केवल कलश नहीं, सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का प्रतीक

नवरात्रि के प्रथम दिन घटस्थापना या कलश स्थापना की जाती है। सामान्य दृष्टि से यह पूजा की शुरुआत है, परन्तु शास्त्रीय दृष्टि से यह अत्यंत गहन प्रतीकात्मक अनुष्ठान है।

पुराणों और वैदिक परम्परा में कलश को जीवन, सृष्टि और समृद्धि का प्रतीक माना गया है।

कलश के प्रत्येक अंग का अपना संदेश है—

  • मिट्टी — पृथ्वी और स्थिरता।

  • जल — जीवन, प्राण और चेतना।

  • आम के पत्ते — विकास और हरित ऊर्जा।

  • नारियल — अहंकार का समर्पण तथा चेतना का उत्कर्ष।

  • मौली — संकल्प और मर्यादा।

  • जौ — नए जीवन का अंकुर।

इस प्रकार घटस्थापना हमें यह स्मरण कराती है कि साधना का उद्देश्य केवल ईश्वर को बुलाना नहीं, बल्कि अपने भीतर जीवन की सुप्त सम्भावनाओं को अंकुरित करना भी है।


जौ ही क्यों बोए जाते हैं?

यह प्रश्न बहुत कम लोग पूछते हैं, जबकि इसका उत्तर अत्यन्त रोचक है।

जौ भारतीय कृषि परम्परा की सबसे प्राचीन फसलों में से एक है। यह तीव्र गति से अंकुरित होता है और जीवन की निरन्तर वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।

नवरात्रि में बोए गए जौ यह संदेश देते हैं कि—

जैसे बीज मिट्टी में छिपकर भी भीतर-ही-भीतर विकसित होता है, वैसे ही साधना का वास्तविक विकास भी पहले भीतर होता है, बाहर बाद में दिखाई देता है।

इसीलिए दशमी के दिन इन अंकुरित जवारों को शुभता और समृद्धि का प्रतीक माना जाता है।


अखण्ड दीप का रहस्य

नवरात्रि में अनेक परिवार अखण्ड ज्योति प्रज्वलित करते हैं।

दीपक केवल प्रकाश का स्रोत नहीं, बल्कि भारतीय दर्शन में ज्ञान का प्रतीक है।

दीपक की लौ हमें तीन बातें सिखाती है—

  • स्वयं जलकर भी दूसरों को प्रकाश देना।

  • विपरीत परिस्थितियों में भी ऊपर की ओर बढ़ते रहना।

  • अंधकार को कोसने के स्थान पर स्वयं प्रकाश बनना।

यही कारण है कि नवरात्रि में दीपक केवल पूजा की वस्तु नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन का प्रतीक बन जाता है।

ध्यान रखें:
यदि अखण्ड दीप की निरन्तर देखभाल सम्भव न हो, तो केवल परम्परा निभाने के लिए उसे जलाकर छोड़ देना उचित नहीं। श्रद्धा से प्रतिदिन प्रातः और सायं दीप प्रज्वलित करना भी पूर्णतः पर्याप्त है।


पूजा का स्थान कैसा हो?

वास्तुशास्त्र के अनुसार पूजा-स्थान का ईशान (उत्तर-पूर्व) दिशा में होना श्रेष्ठ माना गया है, क्योंकि इसे ज्ञान और आध्यात्मिक ऊर्जा का क्षेत्र माना जाता है।

किन्तु यदि घर की संरचना ऐसी न हो, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं।

सबसे महत्वपूर्ण है—

  • स्वच्छता,

  • नियमितता,

  • शान्त वातावरण,

  • और श्रद्धा।

वास्तु का उद्देश्य सुविधा और सामंजस्य है, भय उत्पन्न करना नहीं।


नवरात्रि में किन बातों का संकल्प लें?

नवरात्रि के नौ दिनों में यदि कोई साधक केवल निम्न नौ संकल्प भी निभा ले, तो उसकी साधना सार्थक हो सकती है—

  1. असत्य नहीं बोलूँगा।

  2. क्रोध पर नियंत्रण रखूँगा।

  3. भोजन में संयम रखूँगा।

  4. प्रतिदिन जप या ध्यान करूँगा।

  5. किसी एक व्यक्ति की सहायता करूँगा।

  6. माता-पिता एवं गुरुजनों का सम्मान करूँगा।

  7. अनावश्यक आलोचना से बचूँगा।

  8. समय का सदुपयोग करूँगा।

  9. प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण करूँगा।

यही नौ संकल्प, नवरात्रि की नौ रात्रियों को जीवन में उतारने का वास्तविक प्रारम्भ हैं।


क्या देवी को प्रसन्न करना कठिन है?

शास्त्रों का उत्तर है—नहीं।

देवीभागवत में बार-बार यह संकेत मिलता है कि ईश्वर बाहरी वैभव से अधिक भक्ति और निष्कपट भाव को स्वीकार करते हैं।

यदि किसी के पास भव्य पूजा की व्यवस्था नहीं है, किन्तु वह श्रद्धा, सत्य और सदाचार के साथ देवी का स्मरण करता है, तो उसकी उपासना भी उतनी ही मूल्यवान मानी जाती है।

इसीलिए कहा गया है—

भक्ति में साधन नहीं, साधक का भाव सर्वोपरि है।

नवदुर्गा : शक्ति की नौ सीढ़ियाँ, आत्मविकास की नौ अवस्थाएँ

अधिकांश लोग नवरात्रि में प्रतिदिन एक देवी की पूजा करते हैं, उनका नाम लेते हैं, मंत्रों का जप करते हैं और अगले दिन दूसरी देवी की उपासना आरम्भ कर देते हैं। यह परम्परा अत्यन्त पवित्र है, किन्तु यदि हम केवल नामों तक सीमित रह जाएँ तो नवदुर्गा का वास्तविक संदेश अधूरा रह जाता है।

भारतीय ऋषियों ने नवदुर्गा को केवल नौ अलग-अलग देवियों के रूप में नहीं देखा, बल्कि मानव-चेतना के क्रमिक विकास की नौ अवस्थाओं के रूप में भी समझाया है। प्रत्येक देवी साधक के भीतर छिपी किसी एक शक्ति को जागृत करती है। इस दृष्टि से नवरात्रि आत्मपरिवर्तन की एक व्यवस्थित साधना बन जाती है।


प्रथम दिवस : माँ शैलपुत्री

अर्थ – पर्वतराज हिमालय की पुत्री।

शैलपुत्री स्थिरता, धैर्य और दृढ़ संकल्प की प्रतीक हैं। पर्वत की भाँति अचल रहना ही उनकी शिक्षा है। किसी भी आध्यात्मिक यात्रा का प्रथम चरण यही है कि साधक अपने जीवन में स्थिरता लाए।

आज का मनुष्य अनेक दिशाओं में बिखरा हुआ है। विचार बदलते हैं, लक्ष्य बदलते हैं, इच्छाएँ बदलती हैं। ऐसे चंचल मन में साधना टिक नहीं सकती। शैलपुत्री हमें सिखाती हैं कि जिस प्रकार पर्वत आँधी और वर्षा के बीच भी अडिग रहता है, उसी प्रकार साधक को भी परिस्थितियों से विचलित नहीं होना चाहिए।

जीवन-संदेश:
बिना स्थिरता के कोई साधना सफल नहीं होती।


द्वितीय दिवस : माँ ब्रह्मचारिणी

"ब्रह्म" अर्थात् परम सत्य और "चारिणी" अर्थात् उस मार्ग पर चलने वाली।

ब्रह्मचारिणी तप, अनुशासन, अध्ययन और संयम की अधिष्ठात्री हैं। उनका जीवन हमें बताता है कि महान उपलब्धियाँ केवल इच्छा से नहीं, बल्कि निरन्तर अभ्यास और धैर्य से प्राप्त होती हैं।

आज की भाषा में कहें तो वे Self-Discipline की मूर्ति हैं।

जीवन-संदेश:
प्रतिभा से अधिक महत्वपूर्ण है निरन्तर प्रयास।


तृतीय दिवस : माँ चन्द्रघण्टा

माँ चन्द्रघण्टा के मस्तक पर अर्धचन्द्र और उनके गले की घंटा जागृति का प्रतीक मानी जाती है।

उनका स्वरूप अत्यन्त तेजस्वी है, किन्तु भक्तों के लिए करुणामयी भी है।

यह हमें सिखाता है कि जीवन में विनम्रता और सामर्थ्य साथ-साथ चल सकते हैं। सज्जनों के प्रति कोमलता और अधर्म के प्रति दृढ़ता—यही धर्म का संतुलन है।

जीवन-संदेश:
शक्ति का उद्देश्य भय उत्पन्न करना नहीं, अन्याय का प्रतिरोध करना है।


चतुर्थ दिवस : माँ कूष्माण्डा

पुराणों में वर्णन है कि देवी की दिव्य मुस्कान से ब्रह्माण्ड की सृष्टि हुई। इसलिए उन्हें "कूष्माण्डा" कहा गया।

यह कथा प्रतीकात्मक है।

इसका संदेश है कि सकारात्मक ऊर्जा सृजन करती है, जबकि निराशा और नकारात्मकता विनाश का कारण बनती है।

कूष्माण्डा हमें सिखाती हैं कि प्रसन्नता भी आध्यात्मिक शक्ति है।

जीवन-संदेश:
मुस्कान भी साधना का एक रूप है।


पंचम दिवस : माँ स्कन्दमाता

वे भगवान स्कन्द (कार्तिकेय) की माता हैं और मातृत्व, करुणा तथा संरक्षण का स्वरूप मानी जाती हैं।

उनकी गोद में बाल स्कन्द का होना यह संकेत देता है कि शक्ति केवल युद्ध नहीं करती, वह पोषण भी करती है।

आधुनिक जीवन में यह संदेश अत्यन्त प्रासंगिक है। परिवार, समाज और राष्ट्र का भविष्य केवल सामर्थ्य से नहीं, संस्कारों से बनता है।

जीवन-संदेश:
जिस शक्ति में करुणा नहीं, वह पूर्ण शक्ति नहीं।


षष्ठ दिवस : माँ कात्यायनी

महर्षि कात्यायन की तपस्या से प्रकट होने के कारण इन्हें कात्यायनी कहा गया।

वे धर्म की रक्षा के लिए सक्रिय शक्ति का प्रतीक हैं।

जब अन्याय बढ़ता है, तब मौन रहना भी अधर्म का समर्थन बन सकता है।

कात्यायनी हमें सिखाती हैं कि धर्म केवल विचार नहीं, साहसपूर्ण कर्म भी है।

जीवन-संदेश:
सत्य का साथ देने का साहस ही धर्म है।


सप्तम दिवस : माँ कालरात्रि

नवदुर्गा के सभी स्वरूपों में कालरात्रि का स्वरूप सबसे उग्र प्रतीत होता है।

किन्तु यही रूप सबसे अधिक भय का नाश करता है।

उनका काला वर्ण अज्ञान के अंधकार को, खुली जटाएँ प्रकृति की अनन्त शक्ति को और प्रज्वलित नेत्र चेतना के प्रकाश को दर्शाते हैं।

हम सबके भीतर कुछ न कुछ भय रहता है—असफलता का, आलोचना का, मृत्यु का, भविष्य का।

कालरात्रि की उपासना हमें सिखाती है कि भय से भागना नहीं, उसका सामना करना चाहिए।

जीवन-संदेश:
जो अपने भय पर विजय पा लेता है, वही वास्तव में स्वतंत्र होता है।


अष्टम दिवस : माँ महागौरी

महागौरी निर्मलता, पवित्रता और क्षमा की प्रतीक हैं।

उनका गौर वर्ण बाहरी रंग का नहीं, बल्कि अन्तःकरण की शुद्धता का प्रतीक है।

यदि मनुष्य ने जीवन में अनेक भूलें की हों, तब भी सच्चे पश्चाताप, सदाचार और ईश्वर-स्मरण से वह पुनः उज्ज्वल जीवन की ओर लौट सकता है।

यही महागौरी का संदेश है।

जीवन-संदेश:
शुद्धि का मार्ग सदैव खुला रहता है।


नवम दिवस : माँ सिद्धिदात्री

नवरात्रि का अंतिम चरण सिद्धिदात्री का है।

यहाँ "सिद्धि" का अर्थ केवल अलौकिक शक्तियाँ नहीं है।

शास्त्रीय दृष्टि से सिद्धि का अर्थ है—

  • आत्मज्ञान,

  • विवेक,

  • समत्व,

  • ईश्वर के प्रति अटूट श्रद्धा,

  • और धर्ममय जीवन।

नवरात्रि की पूरी यात्रा का उद्देश्य बाहरी उपलब्धियाँ नहीं, बल्कि भीतर की परिपक्वता है।

जीवन-संदेश:
सच्ची सिद्धि स्वयं पर विजय है।


नवदुर्गा और मानव व्यक्तित्व

यदि हम इन नौ स्वरूपों को एक साथ देखें, तो वे मनुष्य के सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास करती हैं—

देवी आन्तरिक गुण
शैलपुत्री स्थिरता
ब्रह्मचारिणी अनुशासन
चन्द्रघण्टा साहस एवं संतुलन
कूष्माण्डा सृजनात्मक ऊर्जा
स्कन्दमाता करुणा एवं संरक्षण
कात्यायनी धर्मरक्षा
कालरात्रि निर्भयता
महागौरी पवित्रता
सिद्धिदात्री आत्मबोध

इसीलिए नवदुर्गा की उपासना केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि व्यक्तित्व निर्माण का एक अद्भुत आध्यात्मिक मॉडल है।


क्या नवदुर्गा का सम्बन्ध योग से भी है?

अनेक योग एवं तांत्रिक परम्पराएँ नवदुर्गा को साधक की आन्तरिक चेतना के क्रमिक जागरण से भी जोड़कर देखती हैं। यद्यपि विभिन्न परम्पराओं में इसकी व्याख्याएँ भिन्न-भिन्न हैं, पर एक बात समान है—आध्यात्मिक उन्नति क्रमशः होती है, एक ही दिन में नहीं।

नवरात्रि हमें धैर्य का यही पाठ पढ़ाती है।

जिस प्रकार बीज धीरे-धीरे अंकुरित होकर वृक्ष बनता है, उसी प्रकार साधक भी अभ्यास, संयम और ईश्वर-कृपा से धीरे-धीरे परिपक्व होता है।


शास्त्र का अंतिम संकेत

नवदुर्गा की यात्रा का सार केवल पूजा नहीं, बल्कि परिवर्तन है।

यदि नौ दिनों के अंत में—

  • हमारा क्रोध कुछ कम हो जाए,

  • हमारी करुणा कुछ बढ़ जाए,

  • हमारा अहंकार कुछ घट जाए,

  • हमारी श्रद्धा कुछ गहरी हो जाए,

तो समझिए कि नवरात्रि सफल हुई।

अन्यथा केवल अनुष्ठान पूरे हुए, साधना नहीं।

नवरात्रि की पूजा-विधि, उपवास का शास्त्रीय अर्थ, दुर्गा सप्तशती का महत्व एवं कन्या पूजन का रहस्य

"भावग्राही जनार्दनः"—अर्थात् भगवान भाव के ग्रहणकर्ता हैं। यही सिद्धान्त देवी-उपासना पर भी समान रूप से लागू होता है। शास्त्रों में पूजा-विधि का विस्तृत वर्णन अवश्य मिलता है, किन्तु सभी ग्रन्थ एक स्वर से यह स्वीकार करते हैं कि विधि का उद्देश्य श्रद्धा को व्यवस्थित करना है, श्रद्धा का स्थान लेना नहीं।

अतः यदि कोई व्यक्ति सभी वैदिक विधियाँ सम्पन्न करने में समर्थ हो तो यह उत्तम है; किन्तु यदि परिस्थितियाँ सीमित हों, तब भी श्रद्धा, पवित्रता और नियमितता के साथ की गई उपासना पूर्णतः स्वीकार्य मानी गई है।


नवरात्रि प्रारम्भ होने से पूर्व क्या तैयारी करें?

नवरात्रि केवल घर की सफाई का नहीं, बल्कि जीवन की सफाई का भी पर्व है। इसलिए तैयारी दो स्तरों पर होनी चाहिए—

1. बाह्य तैयारी

  • घर एवं पूजा-स्थान की स्वच्छता।

  • पूजा सामग्री की व्यवस्था।

  • कलश, नारियल, आम या अशोक के पत्ते (जहाँ उपलब्ध हों), जौ, लाल वस्त्र, दीपक, धूप, पुष्प आदि की तैयारी।

  • यदि दुर्गा सप्तशती का पाठ करना हो, तो पुस्तक पहले से उपलब्ध रखें।

2. आन्तरिक तैयारी

इससे भी अधिक महत्वपूर्ण है—

  • कटु वाणी का त्याग।

  • असत्य से दूरी।

  • क्रोध पर नियंत्रण।

  • सात्त्विक भोजन।

  • संयमित दिनचर्या।

  • ईश्वर-स्मरण का संकल्प।

यदि मन अशान्त है, तो भव्य पूजा भी अधूरी रह जाती है।


कलश स्थापना की शास्त्रीय विधि

कलश स्थापना (घटस्थापना) नवरात्रि का प्रथम और अत्यन्त महत्वपूर्ण अनुष्ठान है। विभिन्न परम्पराओं में इसकी विधि में कुछ भिन्नताएँ मिलती हैं, किन्तु मूल भावना समान रहती है।

सामान्य क्रम इस प्रकार है—

  1. शुभ मुहूर्त में स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें।

  2. पूजा-स्थान को शुद्ध करें।

  3. लकड़ी के पाट या चौकी पर लाल अथवा पीला वस्त्र बिछाएँ।

  4. उस पर स्वच्छ मिट्टी रखकर जौ बोएँ।

  5. जल से भरा कलश स्थापित करें।

  6. कलश में यदि परम्परा अनुसार सम्भव हो तो गंगाजल, सुपारी, अक्षत, दुर्वा अथवा सुगन्धित द्रव्य डालें।

  7. कलश के मुख पर आम या अन्य उपयुक्त पत्ते रखें।

  8. उसके ऊपर नारियल स्थापित करें।

  9. देवी का ध्यान कर संकल्प लें।

  10. दीप प्रज्वलित कर पूजा प्रारम्भ करें।

यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि कलश स्वयं देवी नहीं है। वह देवी की दिव्य उपस्थिति का प्रतीक है। प्रतीक का सम्मान आवश्यक है, किन्तु प्रतीक को ही सम्पूर्ण सत्य मान लेना उचित नहीं।


क्या अखण्ड दीप अनिवार्य है?

यह एक अत्यन्त सामान्य प्रश्न है।

उत्तर है—नहीं।

अखण्ड दीप एक अत्यन्त पवित्र परम्परा है, परन्तु यह तभी किया जाना चाहिए जब उसकी निरन्तर देखभाल सम्भव हो।

यदि घर में छोटे बच्चे हों, अग्नि-सुरक्षा का प्रश्न हो या सभी सदस्य दिनभर बाहर रहते हों, तो केवल परम्परा निभाने के लिए अखण्ड दीप जलाना उचित नहीं।

ऐसी स्थिति में प्रातः और सायंकाल श्रद्धापूर्वक दीप प्रज्वलित करना ही पर्याप्त है।

धर्म का उद्देश्य विवेक है, जोखिम नहीं।


नवरात्रि में उपवास का वास्तविक अर्थ

आज उपवास का अर्थ प्रायः "फलाहार" या "विशेष व्यंजन" तक सीमित हो गया है। किन्तु शास्त्रीय दृष्टि कहीं अधिक व्यापक है।

उपवास = उप + वास

अर्थात् ईश्वर के निकट रहना।

यदि कोई व्यक्ति दिनभर भोजन न करे, किन्तु—

  • क्रोध करता रहे,

  • दूसरों की निन्दा करे,

  • छल-कपट में लगा रहे,

तो उसका उपवास केवल शरीर का होगा, आत्मा का नहीं।

इसके विपरीत यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य कारणों से सामान्य भोजन करे, किन्तु दिनभर जप, संयम, सेवा और आत्मचिन्तन में लगा रहे, तो वह उपवास की भावना के अधिक निकट हो सकता है।


उपवास के आयुर्वेदिक पक्ष

आयुर्वेद के अनुसार ऋतु-संधि के समय पाचन-शक्ति में परिवर्तन होता है। इस अवधि में हल्का, सात्त्विक और सुपाच्य भोजन शरीर के लिए लाभकारी माना गया है।

इस प्रकार नवरात्रि का संयम केवल धार्मिक ही नहीं, स्वास्थ्य की दृष्टि से भी सार्थक है।

ध्यान रहे कि उपवास कभी भी शरीर को अनावश्यक कष्ट देने का माध्यम नहीं होना चाहिए। वृद्ध, गर्भवती महिलाएँ, गंभीर रोगी अथवा चिकित्सकीय कारणों से विशेष आहार लेने वाले व्यक्ति अपने स्वास्थ्य के अनुसार निर्णय लें।


दुर्गा सप्तशती का महत्व

यदि नवरात्रि की साधना का कोई प्रमुख ग्रन्थ है, तो वह है दुर्गा सप्तशती, जिसे देवी महात्म्य या चण्डी पाठ भी कहा जाता है।

यह मार्कण्डेय पुराण का एक अत्यन्त महत्वपूर्ण अंश है और इसमें लगभग 700 श्लोक हैं। इसी कारण इसे "सप्तशती" कहा गया।

इस ग्रन्थ में तीन प्रमुख चरित्रों के माध्यम से देवी की महिमा का वर्णन किया गया है—

  • मधु-कैटभ का वध

  • महिषासुर का वध

  • शुम्भ-निशुम्भ तथा रक्तबीज का वध

किन्तु इन कथाओं का उद्देश्य केवल युद्ध का वर्णन नहीं है। प्रत्येक असुर मानव-मन की किसी नकारात्मक प्रवृत्ति का प्रतीक है।

इस प्रकार दुर्गा सप्तशती वस्तुतः अन्तर्युद्ध का ग्रन्थ है।


यदि सम्पूर्ण सप्तशती का पाठ सम्भव न हो तो?

यह प्रश्न भी अक्सर पूछा जाता है।

यदि समयाभाव हो, तो अनेक परम्पराओं में निम्न का पाठ भी किया जाता है—

  • देवी कवच

  • अर्गला स्तोत्र

  • कीलक स्तोत्र

  • सिद्धकुञ्जिका स्तोत्र

  • "ॐ दुं दुर्गायै नमः" मंत्र का जप

महत्व संख्या का नहीं, नियमितता और श्रद्धा का है।


कन्या पूजन का वास्तविक अर्थ

अष्टमी या नवमी को कन्या पूजन की परम्परा अत्यन्त प्राचीन है।

शास्त्रों में बालिका को देवी के विविध स्वरूपों का प्रतीक मानकर सम्मानित किया गया है।

किन्तु यहाँ एक अत्यन्त महत्वपूर्ण बात समझनी चाहिए—

यदि वर्ष में केवल एक दिन कन्याओं के चरण स्पर्श किए जाएँ और शेष वर्ष उनके सम्मान, शिक्षा, सुरक्षा और अधिकारों की उपेक्षा की जाए, तो यह परम्परा अपने उद्देश्य से दूर हो जाती है।

कन्या पूजन का वास्तविक संदेश है—

समाज की प्रत्येक बालिका में देवी के अंश का सम्मान करना।

यही नवरात्रि की जीवित साधना है।


क्या बलि की परम्परा शास्त्रसम्मत है?

यह विषय विभिन्न क्षेत्रों और परम्पराओं में भिन्न रूप से देखा गया है।

आज के समय में अधिकांश हिन्दू परम्पराएँ प्रतीकात्मक बलि—जैसे कद्दू, नारियल या अन्य फल—को ही स्वीकार करती हैं।

देवी-उपासना का मूल उद्देश्य हिंसा नहीं, बल्कि अपने भीतर के पशुत्व की बलि देना है।

अहंकार, क्रोध, लोभ और मोह का त्याग ही वास्तविक यज्ञ है।


नवरात्रि में क्या करें?

  • प्रतिदिन निश्चित समय पर पूजा करें।

  • यथाशक्ति मंत्र-जप करें।

  • माता-पिता और गुरुजनों का सम्मान करें।

  • किसी आवश्यकता-ग्रस्त व्यक्ति की सहायता करें।

  • सात्त्विक साहित्य पढ़ें।

  • संयमित वाणी रखें।

  • रात्रि में कुछ समय आत्मचिन्तन करें।


नवरात्रि में किन बातों से बचें?

  • क्रोध और कटु वाणी।

  • अनावश्यक विवाद।

  • दिखावे के लिए पूजा।

  • अन्न का अपमान।

  • नशा और तामसिक प्रवृत्तियाँ।

  • धार्मिक कर्मों को केवल सामाजिक प्रदर्शन बना देना।


क्या केवल पूजा ही पर्याप्त है?

नहीं।

यदि नवरात्रि के नौ दिनों में हम केवल आरती करें, किन्तु अपने व्यवहार में कोई परिवर्तन न लाएँ, तो साधना अधूरी रह जाती है।

शास्त्र बार-बार कहते हैं कि धर्म का सर्वोच्च रूप है—

  • सत्य,

  • दया,

  • दान,

  • संयम,

  • और आत्मनियन्त्रण।

यही गुण देवी की वास्तविक आराधना हैं।

नवरात्रि का ज्योतिषीय रहस्य, ऋतु-संधि का विज्ञान, सामान्य भ्रांतियाँ, प्रश्नोत्तर एवं जीवन का शाश्वत संदेश

नवरात्रि का ज्योतिषीय रहस्य

यदि आप वैदिक ज्योतिष का अध्ययन करते हैं, तो एक बात स्पष्ट रूप से समझ में आती है कि भारतीय ऋषियों ने किसी भी पर्व का निर्धारण केवल धार्मिक भावना से नहीं किया। प्रत्येक पर्व के पीछे काल (समय), खगोल, ऋतु, चन्द्रमा, तिथि और मानव-चेतना के बीच गहरा संबंध निहित है।

नवरात्रि इसका सर्वोत्तम उदाहरण है।

भारतीय ज्योतिष में सूर्य आत्मा, जीवनशक्ति और ऋतुचक्र का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि चन्द्रमा मन, भावनाओं और मानसिक स्थिरता का कारक माना गया है। नवरात्रि का निर्धारण भी चन्द्रमास के अनुसार होता है। इसका संकेत यह है कि शक्ति-साधना केवल बाह्य अनुष्ठान नहीं, बल्कि मन के परिष्कार का भी मार्ग है।

जब मन स्थिर होता है, तब मंत्र में शक्ति प्रकट होती है। जब मन चंचल होता है, तब श्रेष्ठ साधना भी अपेक्षित फल नहीं दे पाती। इसलिए नवरात्रि के नौ दिनों में जप, मौन, ध्यान और सात्त्विक जीवन पर इतना बल दिया गया है।


ऋतु-संधि : प्रकृति का मौन परिवर्तन

चैत्र और शारदीय नवरात्रि दोनों ऐसे समय में आती हैं, जब प्रकृति एक ऋतु से दूसरी ऋतु की ओर बढ़ रही होती है। आयुर्वेद इसे ऋतु-संधि कहता है।

यह केवल मौसम बदलने का समय नहीं है, बल्कि शरीर, मन और परिवेश तीनों के अनुकूलन (Adaptation) का काल है।

इसीलिए हमारे ऋषियों ने इस समय—

  • हल्का भोजन,

  • संयम,

  • प्रार्थना,

  • उपवास,

  • और मानसिक शुद्धि

को जीवनचर्या का अंग बनाया।

यदि ध्यान से देखा जाए, तो नवरात्रि आध्यात्मिक साधना के साथ-साथ जीवनशैली (Lifestyle) का भी एक सुविचारित अनुशासन है।


क्या नवरात्रि में ग्रहशान्ति करनी चाहिए?

यह प्रश्न विशेष रूप से ज्योतिष के विद्यार्थियों और परामर्श लेने वाले लोगों के मन में आता है।

उत्तर है—यदि ग्रहशान्ति शास्त्रसम्मत विधि से और योग्य आचार्य के मार्गदर्शन में की जाए, तो नवरात्रि ऐसा करने का एक शुभ अवसर हो सकता है।

किन्तु यहाँ एक बात स्पष्ट समझनी चाहिए—

देवी-उपासना का उद्देश्य ग्रहों से "लड़ना" नहीं है।

वैदिक परम्परा में ग्रह ईश्वर की व्यवस्था का अंग हैं। उपासना का उद्देश्य है—

  • मन को संतुलित करना,

  • शुभ कर्मों की प्रेरणा प्राप्त करना,

  • तथा कठिन परिस्थितियों का धैर्यपूर्वक सामना करने की शक्ति अर्जित करना।

अतः ग्रहदोषों के समाधान में देवी-उपासना एक आध्यात्मिक सहारा हो सकती है, परन्तु उसे कर्म, सदाचार और उचित परामर्श का विकल्प नहीं माना जाना चाहिए।


नवरात्रि और योग

योगशास्त्र का मूल उद्देश्य है—चित्तवृत्ति निरोध अर्थात् मन की चंचलता को नियंत्रित करना।

नवरात्रि की साधना भी इसी दिशा में अग्रसर करती है।

यदि इन नौ दिनों में कोई साधक प्रतिदिन—

  • कुछ समय मौन रहे,

  • नियमित प्राणायाम करे,

  • ध्यान करे,

  • और अपने व्यवहार का निरीक्षण करे,

तो वह नवरात्रि के वास्तविक उद्देश्य के अधिक निकट पहुँच सकता है।


नवरात्रि से जुड़ी सामान्य भ्रांतियाँ

भ्रांति 1 : यदि व्रत टूट जाए तो देवी नाराज़ हो जाती हैं।

सत्य: देवी करुणामयी हैं। यदि स्वास्थ्य या परिस्थितियों के कारण व्रत पूर्ण न हो सके, तो श्रद्धा के साथ सामान्य भोजन करना किसी भी प्रकार से अधर्म नहीं है।


भ्रांति 2 : पूजा में छोटी-सी भूल से बड़ा अनिष्ट हो जाएगा।

सत्य: शास्त्र विधि बताते हैं, भय नहीं। जानबूझकर लापरवाही उचित नहीं, किन्तु अनजाने में हुई त्रुटि के लिए क्षमा-प्रार्थना और श्रद्धा पर्याप्त मानी गई है।


भ्रांति 3 : महँगी पूजा सामग्री से ही देवी प्रसन्न होती हैं।

सत्य: निष्कपट भक्ति किसी भी भौतिक वैभव से अधिक मूल्यवान है।


भ्रांति 4 : केवल महिलाओं को ही देवी-पूजा करनी चाहिए।

सत्य: शक्ति सम्पूर्ण सृष्टि का आधार है। देवी-उपासना स्त्री, पुरुष, बालक, वृद्ध—सभी के लिए समान रूप से कल्याणकारी है।


भ्रांति 5 : कन्या पूजन केवल एक रस्म है।

सत्य: यह रस्म नहीं, बल्कि समाज में नारी और बालिका के सम्मान का सांस्कृतिक संदेश है।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQ)

क्या नवरात्रि में प्रतिदिन मंदिर जाना आवश्यक है?

नहीं। घर में श्रद्धापूर्वक की गई पूजा भी उतनी ही सार्थक है।

क्या बिना व्रत रखे देवी की आराधना की जा सकती है?

हाँ। भक्ति, जप, ध्यान और सात्त्विक जीवन भी देवी-उपासना के महत्वपूर्ण अंग हैं।

क्या प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती का सम्पूर्ण पाठ आवश्यक है?

नहीं। समयाभाव में संक्षिप्त स्तोत्र या मंत्र-जप भी किया जा सकता है।

क्या नवरात्रि में नए कार्य प्रारम्भ करना शुभ है?

उचित मुहूर्त और परिस्थितियों के अनुसार अनेक परम्पराएँ इसे शुभ मानती हैं।

क्या विद्यार्थी नवरात्रि में विशेष साधना कर सकते हैं?

हाँ। नियमित अध्ययन के साथ देवी-स्मरण, अनुशासन और ध्यान एकाग्रता बढ़ाने में सहायक हो सकते हैं।

क्या नवरात्रि में दान करना चाहिए?

हाँ। अन्नदान, वस्त्रदान, शिक्षा-सहायता और सेवा—ये सभी श्रेष्ठ माने गए हैं।


नवरात्रि का जीवन-दर्शन

यदि पूरे नवरात्रि पर्व का सार केवल एक वाक्य में कहना हो, तो वह यह होगा—

नवरात्रि हमें सिखाती है कि सबसे बड़ा युद्ध बाहर नहीं, अपने भीतर लड़ा जाता है।

महिषासुर हमारे भीतर का अहंकार हो सकता है।

रक्तबीज हमारी अनियंत्रित इच्छाएँ हो सकती हैं।

शुम्भ और निशुम्भ हमारे अभिमान और स्वार्थ के प्रतीक हो सकते हैं।

और देवी?

वे हमारे भीतर का—

  • विवेक,

  • साहस,

  • करुणा,

  • धैर्य,

  • और धर्म हैं।

जब ये गुण जागृत होते हैं, तभी वास्तविक विजयादशमी आती है।


उपसंहार

नवरात्रि केवल नौ दिनों का उत्सव नहीं है। यह मनुष्य को स्वयं से मिलने का अवसर है।

इन नौ दिनों में यदि—

  • हमारी वाणी मधुर हो जाए,

  • हमारा मन अधिक शांत हो जाए,

  • हमारा परिवार अधिक सौहार्दपूर्ण हो जाए,

  • हमारी श्रद्धा अधिक गहरी हो जाए,

  • और हमारे कर्म अधिक धर्ममय हो जाएँ,

तो यही देवी की सर्वोत्तम आराधना है।

शक्ति की उपासना का उद्देश्य शक्ति का प्रदर्शन नहीं, बल्कि शक्ति का सदुपयोग है।

यही सनातन धर्म का संदेश है।


सनातन शास्त्रों का उद्देश्य केवल कर्मकाण्ड का वर्णन करना नहीं, बल्कि मनुष्य को धर्म, विवेक और आत्मबोध की ओर अग्रसर करना है। इस ज्ञानकोश का उद्देश्य भी यही है कि प्राचीन ग्रन्थों में निहित ज्ञान को प्रामाणिक, सरल और व्यावहारिक रूप में आधुनिक पाठकों तक पहुँचाया जा सके।

विश्वजीत बब्बल
वैदिक ज्योतिष, वास्तु एवं अंकशास्त्र के अध्येता और परामर्शदाता


समापन प्रार्थना

सर्वमङ्गलमाङ्गल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥

माँ भगवती की कृपा से आपके जीवन में धर्म, स्वास्थ्य, सद्बुद्धि, साहस, समृद्धि और आत्मिक शान्ति का सदैव वास हो।

॥ जय माता दी ॥

 

1 comment

How can a woman perform puja or sadhna or navratri rituals , if she is in periods?

Plz guide.

Jyoti L

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