ब्रह्म का वह दिव्य स्वरूप जो सबको आलोकित करता है
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“यद् भ्राजति विश्वेन संनादति यज्ज्योतिषां ज्योतिरुक्तं पुरस्तात्।
विश्वं यद्विश्वेन संनादति यत्तद्विदुः परं ब्रह्म यद्वै यदात्मा ॥”
— मुण्डकोपनिषद्, द्वितीय मुण्डक, प्रथम खण्ड, मंत्र ४
✦ ब्रह्म का वह दिव्य स्वरूप जो सबको आलोकित करता है
मुण्डकोपनिषद् वेदांत का एक अप्रतिम उपनिषद है, जिसमें ब्रह्मविद्या का गंभीरतम प्रतिपादन किया गया है। यह उपनिषद साधक को केवल ज्ञान नहीं, अपितु अनुभव तक ले जाने का मार्ग दिखाता है। इसके द्वितीय मुण्डक के प्रथम खण्ड में स्थित यह चतुर्थ मंत्र अद्वैत वेदांत की उस मूल भावना को उद्घाटित करता है जिसमें ब्रह्म, आत्मा, और विश्व तीनों में अभेद की अनुभूति होती है।
यह मंत्र उन दिव्य सत्य का उद्घोष करता है जिसे केवल तर्क या बौद्धिक चिन्तन से नहीं, वरन् अनुभूति द्वारा ही जाना जा सकता है।
✦ “ज्योतिषां ज्योतिः” — प्रकाश का भी परम प्रकाश
ज्योतिषां ज्योतिः — इसका अर्थ है प्रकाशों का भी प्रकाश। हम देखते हैं सूर्य तेज देता है, अग्नि उष्मा और प्रकाश देती है, चन्द्रमा शीतलता सहित प्रकाश देता है। किन्तु यह सब सापेक्ष हैं — ये स्वयंप्रकाश नहीं, किसी कारण से प्रकाशित हैं। यह मंत्र उस परब्रह्म की ओर संकेत करता है जो इन सभी प्रकाशों को प्रकाशित करता है। जो इनका भी आधार है, कारण है।
उदाहरणार्थ, जिस प्रकार एक दीपक अन्धकार को हटाने में समर्थ होता है, परन्तु यदि कोई उस दीपक को जलाने वाला न हो, तो वह भी अन्धकार में रहेगा। उसी प्रकार सूर्य, अग्नि आदि प्रकाश के साधन हैं, परन्तु ब्रह्म — वह आत्मा — वह सर्वोच्च चेतना, वह स्वयंप्रकाश रूप है — किसी अन्य के द्वारा प्रकाशित नहीं।
✦ “संनादति” — सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड की प्रतिध्वनि
यह शब्द "संनादति" अत्यन्त मार्मिक है। इसका अर्थ है — जो सम्पूर्ण विश्व को अपनी ध्वनि, अपनी उपस्थिति, अपनी प्रेरणा से गुंजित करता है। शंकराचार्य जी के अनुसार, यह ब्रह्म न केवल स्थूल रूप से प्रकाशक है, अपितु सूक्ष्म रूप से चेतना का प्रेरक भी है।
जिस प्रकार जल में पत्थर फेंकने पर तरंगें उत्पन्न होती हैं, वैसे ही यह सम्पूर्ण जगत् परब्रह्म के स्पन्दन से उत्पन्न तरंग है — यही कार्य-जगत उस कारण-ब्रह्म की प्रतिध्वनि है।
✦ “यद्वै यदात्मा” — आत्मा ही ब्रह्म है
इस मंत्र का अन्तिम वाक्य — “यद्वै यदात्मा” — स्पष्ट करता है कि आत्मा और ब्रह्म कोई दो वस्तुएं नहीं, अपितु एक ही सत्य के दो दृष्टिकोण हैं।
एक दृष्टांत लें — जल और लहर। लहर को हम एक पृथक वस्तु समझते हैं, परन्तु वस्तुतः वह केवल जल का एक स्वरूप है। इसी प्रकार आत्मा (जो हमें अपने भीतर अनुभव होती है) और ब्रह्म (जो सर्वत्र विद्यमान है) — दोनों एक ही चैतन्य के रूप हैं।
यह वही गूढ़ तत्त्व है जिसे महावाक्य कहते हैं — "अहं ब्रह्मास्मि", "तत्त्वमसि", "प्रज्ञनं ब्रह्म"।
✦ परब्रह्म का अनुभव ही मुक्ति है
यह मंत्र केवल एक ज्ञानसूत्र नहीं है, यह एक मार्गदर्शक भी है — साधक से कहता है कि तू जिस प्रकाश को बाहर खोज रहा है, वह तेरे भीतर ही विद्यमान है। सत्य कहीं बाहर नहीं, तुझमें ही है। उसी का अनुभव ही परम शान्ति है — वह शांति जो न तो इन्द्रियजन्य सुख है, न ही बौद्धिक संतोष; अपितु द्वैत के सम्पूर्ण समापन का चिरस्थायी आनन्द है।
जैसे दीपक की लौ बुझते ही सारा कक्ष अन्धकार में डूब जाता है, वैसे ही जब आत्मा से संपर्क टूटता है, तब सारा जीवन अज्ञानरूप अंधकार में डूब जाता है। पर जब साधक उस “ज्योतिषां ज्योतिः” को पहचान लेता है, तब वह स्वयं आलोकित हो उठता है — और वही मुक्ति है।
✦ शास्त्रार्थ और अनुभूति का संगम
यह मंत्र शास्त्रीय गूढ़ता के साथ-साथ अनुभव की आत्मगंध भी देता है। उपनिषद् केवल तर्क नहीं, साक्षात्कार की बात करता है। श्रवण, मनन और निदिध्यासन की त्रिवेणी में यह मंत्र ब्रह्म के अनुभव को संभव बनाता है।
✦ निष्कर्ष: आत्मा की ओर लौटो
इस मंत्र की अंतिम प्रेरणा यही है कि बाह्य संसार में भटकने की अपेक्षा, अपने भीतर के उस प्रकाश को पहचानो, जो तुम्हें जानने, देखने, सुनने और समझने की शक्ति देता है। वही आत्मा है, वही ब्रह्म है, वही मुक्तिदाता है।
यह मंत्र केवल वाक्य नहीं, ब्रह्म की अनुभूति का उद्घोष है। यह साधक के हृदय में वह अग्नि जलाता है, जो उसे अज्ञान के अन्धकार से निकालकर ब्रह्मस्वरूप प्रकाश की ओर ले जाती है।
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1 comment
आपके इस गूढ़ और प्रेरणादायक वाक्य ने हृदय को स्पर्श किया। सचमुच, मंत्र केवल उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मा की गूंज होती है — वह कंपन जो साधक को सांसारिक मोह से ऊपर उठाकर ब्रह्म की अनुभूति कराता है। ऐसे विचार न केवल प्रेरित करते हैं, बल्कि साधना के मार्ग पर दृढ़ता भी प्रदान करते हैं। आभार इस दिव्य विचार-संप्रेषण के लिए। 🌺🙏